जब स्टीव जॉब्स ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़ी थी तो शायद ही किसी को कोई फर्क पड़ा हो लेकिन अब जब उन्होंने एप्पल के सीईओ पद को छोड़ा है तो सारी दुनिया हिल गई है और बाजार में भूकंप सा आ गया है।
केवल एक सेमेस्टर के बाद पढ़ाई छोड़ देने वाले स्टीव को प्रतिभा का धनी छात्र माना जाता था। स्टीव ७० के दशक में पढ़ाई करने के बजाय अध्यात्म की तलाश में भारत आ गए और जब वे अमेरिका वापस लौटे तो बौद्ध बन चुके थे हालांकि उनके पिता एक सीरियाई मुसलमान थे।
लगभग चार साल के कम समय में ही आईपैड और आईफोन से दुनिया में छा जाने वाले एप्पल का दिल, दिमाग और आत्मा जॉब्स को ही माना जाता है। दुनिया के दूसरे सीईओ की तरह टाई और कोर्ट के बजाय वे पूरी बांह की काली टी शर्ट और जींस पहनना पसंद करते हैं। जॉब्स ने १९७६ में अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एप्पल कम्प्यूटर को शुरू किया था।
अथक मेहनत से कंपनी तो जम गई लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि जॉब्स का कंपनी के साथ बने रहना मुश्किल हो गया और अंतत: १९८५ में उन्हें एप्पल कम्प्यूटर को छोड़ देना पड़ा। लेकिन उनका जाना कंपनी के लिए नुकसान दायक सिद्ध हुआ और जितनी तरक्की कंपनी ने उनके नेतृत्व में की जॉब्स के बाद वह तरक्की थमने लगी।
इसी बीच माइक्रोसॉफ्ट को टक्कर देने के लिए एप्पल को जॉब्स की जरूरत महसूस हुई और उन्हें १२ साल बाद एक बार फिर से १९९७ में एप्पल में वापस बुला लिया गया। उनके नेतृत्व में कंपनी ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ी और बाजार में मैकबुक और मैक पीसी नाम के उत्पाद उतारे। इन उत्पादों के बाद कंपनी की प्रसिद्धि और बाजार दोनों में ही काफी इजाफा हुआ।
अपनी दूसरी पारी की शुरू करने के १० बाद जॉब्स को उस समय भारी सफलता मिली जब एप्पल ने आईफोन का निर्माण कर दिया। इसके बाद तो जॉब्स और कंपनी के रूतबे में अचानक से ही बहुत बढ़ोतरी हुई। कुछ लोगों ने तो आईफोन के निर्माण को तकनीकी क्रांति की संज्ञा दे दी और यह बात कुछ हद तक सही भी थी क्योंकि केवल बात और मैसेज तक सीमित रहने वाला मोबाइल फोन एक चलता-फिरता कम्प्यूटर जो बन गया था
लेकिन तकनीकी क्षेत्र का यह व्यक्ति अपने स्वास्थ्य से हार गया। लीवर और कैंसर से ग्रसित होने के बाद जॉब्स ने कंपनी के सीईओ पद से इस्तीफा दे दिया। जॉब्स अपने कार्यकाल के दौरान कंपनी से वेतन के रूप में केवल एक डॉलर की राशि लेते रहे हैं, हालांकि उनके समस्त खर्चे कंपनी ही उठाती रही है।
बीमारी का असर उनके व्यक्तित्व पर भी पड़ा और वे एक जिद्दी नेता बन गए जो हर हाल में अपने एजेंडे को पूरा करना चाहता है। इसे उनकी मेहनत का ही परिणाम कहा जा सकता है कि आज एप्पल दुनिया का सबसे ब्रांड बन गया है।
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Thursday, September 15
खुशखबरीः अब रोमिंग पर नहीं लगेगा कोई चार्ज!
मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाले करोड़ों लोगों के लिए बड़ी खुशखबरी है। दरअसल टेलीकॉम पॉलिसी 2011 के ड्राफ्ट में इस बात की सिफारिश कर दी गई है कि नेशनल रोमिंग के दौरान लगाए जाने वाले शुल्कों को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। इससे उन मोबाइल उपभोक्ताओं को काफी फायदा होगा जो अक्सर अपने राज्य से बाहर सफर करते रहते हैं। इसके लिए नई पॉलिसी में- ‘वन नेशन, वन लाइसेंसे’ की पॉलिसी अपनाने की बात कही गई है।
आपको बता दें कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में मोबाइल ऑपरेटरों के लिए ‘सिंगल परमिट लाइसेंस’ की व्यवस्था है। यानी एक ही परमिट पर वे देशभर में टेलीकॉम सेवाएं दे सकते हैं। जबकी भारत को 22 अलग अलग टेलीकॉम सर्किलों में बांटा गया है। और मोबाइल कंपनियों को सभी सर्किलों के लिए अलग अलग लाइसेंस लेना पड़ता है। ऐसे में मोबाइल ग्राहक भी जब अलग अलग सर्किलों में जाते हैं तो उनसे इसके लिए चार्ज वसूला जाता है।
लेकिन नई टेलीकॉम पॉलिसी के प्रस्तावों से इस समस्या से निजात मिल सकती है। माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक इन प्रस्तावों को पेश कर दिया जाएगा। और अगर इन्हे लागू कर दिया जाता है तो मोबाइल इस्तेमाल करने वाले लोगों को इससे काफी फायदा होगा।
आपको बता दें कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में मोबाइल ऑपरेटरों के लिए ‘सिंगल परमिट लाइसेंस’ की व्यवस्था है। यानी एक ही परमिट पर वे देशभर में टेलीकॉम सेवाएं दे सकते हैं। जबकी भारत को 22 अलग अलग टेलीकॉम सर्किलों में बांटा गया है। और मोबाइल कंपनियों को सभी सर्किलों के लिए अलग अलग लाइसेंस लेना पड़ता है। ऐसे में मोबाइल ग्राहक भी जब अलग अलग सर्किलों में जाते हैं तो उनसे इसके लिए चार्ज वसूला जाता है।
लेकिन नई टेलीकॉम पॉलिसी के प्रस्तावों से इस समस्या से निजात मिल सकती है। माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक इन प्रस्तावों को पेश कर दिया जाएगा। और अगर इन्हे लागू कर दिया जाता है तो मोबाइल इस्तेमाल करने वाले लोगों को इससे काफी फायदा होगा।
Saturday, February 5
एलियंस के अस्तित्व पर हॉकिंग की मुहर
इस ब्रह्मांड के दूसरे ग्रहों में प्राणी अवश्य ही हैं लेकिन लोगों को उनसे बचकर रहना चाहिए. ये चेतावनी है ब्रिटेन के जाने-माने वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग की.
टेलीविज़न के डिस्कवरी चैनल पर एक सिरीज़ दिखाई जा रही है जिसमें स्टीवन हॉकिंग ने माना कि यह पूरी तरह से तार्किक है कि बौद्धिक प्राणी अन्य ग्रहों पर भी होंगे.
उन्होंने कहा कि संभव है कि वो संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें और फिर आगे बढ़ जाएं.
उन्होने कहा, "अगर एलियन पृथ्वी पर आते हैं तो उसका वैसा ही परिणाम होगा जैसा कोलम्बस के अमरीका पहुंचने पर वहां के मूल निवासियों का हुआ था".
स्टीवन हॉकिंग मानते हैं कि दूसरे ग्रहों के प्राणियों से संपर्क करने की कोशिश करने से बेहतर ये होगा कि हम उससे बचें.
इसकी व्याख्या करते हुए उन्होने कहा, "इसके लिए हमें अपने आपको देखने की ज़रूरत है कि बौद्धिक जीव का विकास उस शक्ल में हो सकता है जिससे हम न मिलना चाहें".
अतीत में मानव ने अंतरिक्ष में ऐसे खोजी यान भेजे हैं जिनमें मानव के नक्काशीदार चित्र और पृथ्वी की स्थिति बताने वाले नक्शे रखे हुए थे.
स्टीवन हॉकिंग ने कहा कि इस ब्रह्मांड में अनगिनत आकाशगंगाएं हैं इसलिए यह सोचना कि उनमें कहीं न कहीं जीवन होगा बिल्कुल तार्किक है.
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी चुनौती यह पता करना है कि वो देखने में कैसे होंगे".
डिस्कवरी चैनल पर दिखाई जाने वाली इस सिरीज़ में कई तरह के जीवों की कल्पना की गई है जिनमें दो पैरों पर चलने वाले शाकाहारी जीव से लेकर शिकार करने वाले छिपकलीनुमा जीव शामिल हैं.
टेलीविज़न के डिस्कवरी चैनल पर एक सिरीज़ दिखाई जा रही है जिसमें स्टीवन हॉकिंग ने माना कि यह पूरी तरह से तार्किक है कि बौद्धिक प्राणी अन्य ग्रहों पर भी होंगे.
उन्होंने कहा कि संभव है कि वो संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें और फिर आगे बढ़ जाएं.
उन्होने कहा, "अगर एलियन पृथ्वी पर आते हैं तो उसका वैसा ही परिणाम होगा जैसा कोलम्बस के अमरीका पहुंचने पर वहां के मूल निवासियों का हुआ था".
स्टीवन हॉकिंग मानते हैं कि दूसरे ग्रहों के प्राणियों से संपर्क करने की कोशिश करने से बेहतर ये होगा कि हम उससे बचें.
इसकी व्याख्या करते हुए उन्होने कहा, "इसके लिए हमें अपने आपको देखने की ज़रूरत है कि बौद्धिक जीव का विकास उस शक्ल में हो सकता है जिससे हम न मिलना चाहें".
अतीत में मानव ने अंतरिक्ष में ऐसे खोजी यान भेजे हैं जिनमें मानव के नक्काशीदार चित्र और पृथ्वी की स्थिति बताने वाले नक्शे रखे हुए थे.
स्टीवन हॉकिंग ने कहा कि इस ब्रह्मांड में अनगिनत आकाशगंगाएं हैं इसलिए यह सोचना कि उनमें कहीं न कहीं जीवन होगा बिल्कुल तार्किक है.
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी चुनौती यह पता करना है कि वो देखने में कैसे होंगे".
डिस्कवरी चैनल पर दिखाई जाने वाली इस सिरीज़ में कई तरह के जीवों की कल्पना की गई है जिनमें दो पैरों पर चलने वाले शाकाहारी जीव से लेकर शिकार करने वाले छिपकलीनुमा जीव शामिल हैं.
पहले कौन आया अंडा या मुर्गी
बढ़ती उम्र इंसान को कभी रास नहीं आई. शायद यही वजह है कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने वृद्ध चूहों को जवान बनाने का प्रयोग शुरु किया.
वृद्ध चूहों के शिथिल अंगों में सुधार ने उनकी उम्र की रफ़्तार को उलट दिया गया और ये चूहे वृद्धावस्था से जवानी की ओर चल पड़े.
शोध कहता है कि ये प्रयोग इंसान पर सफल रहे तो वह दिन भी दूर नहीं जब उम्र नहीं ढलेगी और लोग सदा जवान रहेंगे.
सदियों से ये सवाल हमें उलझाता रहा है कि पहले कौन आया अंडा या मुर्गी, लेकिन इस साल ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने इस उलझन को भी सुलझा लिया.
वैज्ञानिकों ने पाया कि मुर्गी के अंडे ‘ओवोक्लेडिडिन-17’ नामक एक प्रोटीन से बनते हैं जो अंडे का खोल बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है और मुर्गी के गर्भाशय में ही पाया जाता है.
यानी अंडा तभी बन सकता है जब मुर्गी का अस्तित्व हो!
वृद्ध चूहों के शिथिल अंगों में सुधार ने उनकी उम्र की रफ़्तार को उलट दिया गया और ये चूहे वृद्धावस्था से जवानी की ओर चल पड़े.
शोध कहता है कि ये प्रयोग इंसान पर सफल रहे तो वह दिन भी दूर नहीं जब उम्र नहीं ढलेगी और लोग सदा जवान रहेंगे.
सदियों से ये सवाल हमें उलझाता रहा है कि पहले कौन आया अंडा या मुर्गी, लेकिन इस साल ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने इस उलझन को भी सुलझा लिया.
वैज्ञानिकों ने पाया कि मुर्गी के अंडे ‘ओवोक्लेडिडिन-17’ नामक एक प्रोटीन से बनते हैं जो अंडे का खोल बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है और मुर्गी के गर्भाशय में ही पाया जाता है.
यानी अंडा तभी बन सकता है जब मुर्गी का अस्तित्व हो!
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